फतेहपुर सीकरी में आबादी की जमीन को लेकर घमासान, पीड़ित परिवार का सवाल न्यायालय में दूसरी जमीन का मामला है तो हमारी जमीन का फैसला कैसे होगा
आगरा के फतेहपुर सीकरी में आबादी की जमीन को लेकर चल रहा विवाद अब एक बेहद अहम सवाल पर आ गया है। पीड़ित परिवार का कहना है कि विपक्षी पक्ष ने दीवानी न्यायालय में जिस जमीन के दस्तावेज लगाकर मुकदमा विचाराधीन होने की बात कही है, वह जमीन उनकी विवादित आबादी भूमि है ही नहीं। ऐसे में पीड़ित परिवार का सीधा सवाल है कि जब न्यायालय में कागजात किसी दूसरी जमीन के हैं तो उस मुकदमे में उनकी जमीन का फैसला आखिर किस आधार पर किया जाएगा।
मामला IGRS संदर्भ संख्या 40014626042960 से जुड़ा है। शिकायत के बाद राजस्व विभाग की ओर से लेखपाल भूपेंद्र सिंह ने 16 जुलाई 2026 और 21 जुलाई 2026 को मौके पर स्थलीय जांच की थी। जांच आख्या में विवादित स्थल को आबादी भूमि के अंतर्गत बताया गया है। वहीं जांच के दौरान विपक्षी पक्ष द्वारा आगरा दीवानी न्यायालय में विचाराधीन वाद संख्या 1142/2024 से संबंधित दस्तावेज प्रस्तुत किए गए।
पीड़ित परिवार का कहना है कि उन्होंने जब विपक्षी पक्ष द्वारा न्यायालय में लगाए गए दस्तावेजों की जांच की तो दस्तावेजों में दर्ज जमीन की चौहद्दी और मौके पर मौजूद उनकी जमीन की चौहद्दी अलग निकली। परिवार के मुताबिक जिस जमीन को लेकर न्यायालय में मुकदमा चलने की बात कही जा रही है, उसका उनकी जमीन से कोई संबंध नहीं है।
यही बात अब पूरे विवाद का सबसे बड़ा सवाल बन गई है। पीड़ित परिवार का कहना है कि यदि विपक्षी द्वारा न्यायालय में किसी दूसरी जमीन के दस्तावेज लगाए गए हैं, तो न्यायालय उस दस्तावेज में दर्ज जमीन के संबंध में फैसला करेगा। फिर उनकी आबादी की जमीन को उस मुकदमे से जोड़कर कैसे देखा जा सकता है।
राजस्व विभाग की जांच आख्या में भी न्यायालय में विचाराधीन जमीन की चौहद्दी और मौके की विवादित जमीन की स्थिति में अंतर का उल्लेख किया गया है। रिपोर्ट के अनुसार विचाराधीन वाद की चौहद्दी पूर्व में सड़क, पश्चिम में अब्दुल सत्तार की भूमि, उत्तर में हाजी बली मोहम्मद की भूमि और दक्षिण में अब्दुल सत्तार की भूमि बताई गई है। जांच रिपोर्ट में कहा गया कि यह चौहद्दी मौके पर मौजूद विवादित स्थल से मेल नहीं खाती।
पीड़ित परिवार का कहना है कि उनके पास अपनी आबादी की जमीन से संबंधित पुराने दस्तावेज मौजूद हैं। परिवार ने जांच के दौरान वर्ष 1950 का स्टाम्प, वर्ष 2013 का शपथपत्र और नगर पालिका परिषद फतेहपुर सीकरी की विभिन्न कर रसीदें भी प्रस्तुत की थीं। परिवार का दावा है कि उनके दस्तावेजों में दर्ज चौहद्दी मौके की जमीन से मेल खाती है।
पीड़ित परिवार के अनुसार जमीन को लेकर विवाद वर्षों से चला आ रहा है। परिवार का दावा है कि वर्ष 2010 से ही इस मामले को लेकर शिकायतें की जा रही हैं। उनका कहना है कि पिछले करीब डेढ़ साल से विवाद और अधिक बढ़ गया है तथा उनकी जमीन पर कब्जे की कोशिश का आरोप लगातार लगाया जा रहा है।
परिवार ने गंभीर आरोप लगाते हुए कहा कि उन्हें आशंका है कि किसी स्तर पर विपक्षी पक्ष को यह सलाह दी गई कि विवादित जमीन के बजाय किसी अन्य जमीन से संबंधित कागजात लगाकर उसे ही विवादित स्थल के रूप में प्रस्तुत किया जाए। हालांकि इस आरोप की स्वतंत्र पुष्टि नहीं हुई है और संबंधित कर्मचारी या विपक्षी पक्ष का इस आरोप पर पक्ष सामने नहीं आया है।
पीड़ित परिवार का कहना है कि जब उन्होंने अदालत में लगाए गए कागजातों की चौहद्दी और जमीन का मिलान किया तो उन्हें पता चला कि उन दस्तावेजों में दर्ज भूमि उनकी जमीन नहीं है। परिवार का सवाल है कि यदि वह जमीन किसी और की है और उससे उनका कोई लेना-देना नहीं है, तो फिर उनकी जमीन को लेकर वास्तविक दीवानी मुकदमा कहां है।
परिवार का आरोप है कि जमीन पर कब्जे को लेकर उन्हें लगातार परेशान किया जा रहा है। उनका कहना है कि वे अपनी जमीन की देखभाल या सफाई करने जाते हैं तो गाली गलौज की जाती है और विरोध का सामना करना पड़ता है। परिवार प्रशासन से मांग कर रहा है कि मौके की जमीन, दस्तावेजों और न्यायालय में लंबित वाद की जमीन का राजस्व अभिलेखों के आधार पर स्पष्ट मिलान कराया जाए।
राजस्व जांच में विवादित स्थल को आबादी भूमि के अंतर्गत बताया गया है। जांचकर्ता ने दोनों पक्षों को सक्षम दीवानी न्यायालय आगरा में वाद दायर कर आवश्यक अनुतोष प्राप्त करने की सलाह दी है। हालांकि पीड़ित परिवार का कहना है कि वह न्यायालय जाने से पीछे नहीं हट रहा, लेकिन पहले यह स्पष्ट होना चाहिए कि विपक्षी पक्ष जिस मुकदमे और कागजात का हवाला दे रहा है, वह वास्तव में किस जमीन से संबंधित है।
पीड़ित परिवार का सबसे बड़ा सवाल यही है कि दूसरी जमीन के कागजात पर चल रहे मुकदमे का फैसला यदि उस दूसरी जमीन के संबंध में होना है, तो उनकी आबादी की जमीन का फैसला उस मुकदमे से कैसे होगा। परिवार का कहना है कि उनकी जमीन के दस्तावेज अलग हैं और उनके भूखंड से संबंधित मुकदमा होने का उन्हें कोई स्पष्ट रिकॉर्ड नहीं दिख रहा है।
पीड़ित परिवार ने प्रशासन से पूरे मामले की निष्पक्ष जांच की मांग की है। उनका कहना है कि अधिकारियों द्वारा मौके की पैमाइश, दोनों पक्षों के दस्तावेजों की चौहद्दी और न्यायालय में विचाराधीन वाद की जमीन का स्पष्ट मिलान कराया जाए, ताकि वर्षों से चले आ रहे विवाद का सही तथ्य सामने आ सके।
फिलहाल जमीन के स्वामित्व का अंतिम निर्णय राजस्व जांच से नहीं हुआ है। न्यायालय में लंबित वाद की वास्तविक सीमा और उसके दस्तावेजों की वैधता का निर्णय सक्षम न्यायालय द्वारा किया जाएगा। वहीं पीड़ित परिवार द्वारा लगाए गए आरोपों की स्वतंत्र पुष्टि नहीं हुई है। दूसरे पक्ष का विस्तृत पक्ष सामने आने के बाद ही विवाद की पूरी तस्वीर स्पष्ट हो सकेगी।



