पूजा मेरी जान’ में मृणाल ठाकुर और हुमा कुरैशी एक साथ नजर आ रही हैं। यह एक ऐसी कहानी है जिसमें सिर्फ रोमांटिक ड्रामा से कहीं ज्यादा कुछ है। ZEE5 की इस नई फिल्म में क्या-क्या है, यह जानने के लिए आगे पढ़ें।
फिल्म की शुरुआत शेक्सपियर के नाटक ‘रोमियो एंड जूलियट’ के परफॉर्मेंस से होती है। सुनने में रोमांटिक लगता है? अरे… असल में ऐसा नहीं है। ‘पूजा मेरी जान’ Zee5 की नई फिल्म है। फिल्म का नाम सुनकर आपको लग सकता है कि यह कोई आम रोमांटिक-कॉमेडी फिल्म होगी। लेकिन मृणाल ठाकुर और हुमा कुरैशी की यह फिल्म उससे बिल्कुल अलग है। बॉलीवुड में एकतरफा प्यार, रिजेक्शन और इल्जाम लगाने वाली कहानियां कोई नई बात नहीं हैं। ‘पूजा मेरी जान’ की कहानी भी इसी थीम पर बनी है। लेकिन क्या यह फिल्म अलग है और क्या इसमें ‘थ्रिल’ है? आइए जानते हैं।
पूजा मेरी जान: कहानी क्या है?
यह कहानी अनिकेत श्रीवास्तव (विक्रम सिंह चौहान) और पूजा डोगरा (मृणाल ठाकुर) के इर्द-गिर्द घूमती है, जो अपनी थिएटर सोसाइटी के ज़रिए दोस्त बनते हैं। जहां अनिकेत पूजा से बहुत प्यार करता है और उससे शादी करना चाहता है, वहीं पूजा के मन में वैसी भावनाएं नहीं हैं। कहानी में मोड़ तब आता है जब अनिकेत बिना उसकी इजाजत के सबके सामने उसे प्रपोज कर देता है। पूजा उसका प्रपोज़ल ठुकरा देती है और बताती है कि वह उससे प्यार नहीं करती और विक्रम (प्रियांश जोरा) के साथ अपनी जिंदगी बसाना चाहती है। अनिकेत इस इनकार को बर्दाश्त नहीं कर पाता और पूजा से बहस के बाद अपनी जान देने का फ़ैसला करता है, ठीक वैसे ही जैसे स्टेज प्ले में उसका किरदार रोमियो करता है।
लेकिन असली कहानी अनिकेत की मौत के बाद शुरू होती है। जल्द ही पूजा पर अनिकेत की आत्महत्या का आरोप लगने लगता है और उसे लोगों की कड़ी आलोचना का सामना करना पड़ता है, क्योंकि इंटरनेट यूजर्स इस घटना के लिए उसे ही जिम्मेदार मानते हैं। दूसरी ओर, अनिकेत का परिवार मामले को कोर्ट ले जाने का फैसला करता है, जबकि पुलिस इस बात की जांच शुरू करती है कि क्या अनिकेत की मौत में पूजा की कोई भूमिका थी। फ़िल्म कहानी को कोर्टरूम तक ले जाती है और इस मामले से जुड़ी दलीलों को दिखाती है।
पूजा मेरी जान: एक्टिंग और परफॉर्मेंस
मृणाल ठाकुर ने पूजा डोगरा के रोल में दमदार एक्टिंग की है। उन्होंने इमोशनल और गंभीर दृश्यों को बखूबी निभाया है और अपने किरदार में गहराई लाई है। खास तौर पर इंटेंस सीन में उनका काम बहुत असरदार रहा है और उन्होंने रोल की जरूरतों को बखूबी पूरा किया है।
विक्रम सिंह राज चौहान का रोल भले ही छोटा है, लेकिन वे अपनी गहरी छाप छोड़ते हैं क्योंकि कहानी में उनका किरदार अहम है। हालांकि, उनके किरदार को और बेहतर तरीके से लिखा जा सकता था। हुमा कुरैशी ने सना के रोल में अच्छा काम किया है; वे एक कॉर्पोरेट लॉयर बनी हैं जो अपनी दोस्त पूजा का केस तब लड़ती हैं जब पूजा का साथ देने वाला कोई नहीं होता।
विजय राज ने जतिन त्रिवेदी के रोल में, जो अनिकेत का केस लड़ रहे लॉयर हैं, अपने अनुभव का बखूबी इस्तेमाल किया है। उनके किरदार के कई शेड्स हैं, जो कहानी में गहराई लाते हैं। ‘पंचायत’ जैसे शो में कॉमिक रोल के लिए मशहूर सुनीता राजवार ने यहां SHO सुशीला चौहान का रोल निभाया है। स्क्रीन पर कम समय मिलने के बावजूद, उन्होंने अपने किरदार के साथ न्याय करने की कोशिश की है और अच्छा काम किया है। दिवंगत एक्टर ऋतुराज सिंह फिल्म में कम समय के लिए दिखे हैं, लेकिन उन्होंने बेहतरीन एक्टिंग की है। इसे सिंह की आखिरी ऑन-स्क्रीन अपीयरेंस में से एक भी माना जा रहा है। मनुज शर्मा और सुपर्णा मारवाह समेत सपोर्टिंग कास्ट ने भी कुल मिलाकर अच्छा काम किया है।
पूजा मेरी जान: लेखन, निर्देशन और तकनीकी पहलू
नवजोत गुलाटी ने फिल्म के पहले हिस्से को काफी दिलचस्प बनाए रखा है, और निर्देशन तब सबसे अच्छा लगता है जब फिल्म अपनी मुख्य कहानी से जुड़ी रहती है। नवजोत गुलाटी और कनिष्का सिंह देव ने मिलकर फ़िल्म की कहानी लिखी है, लेकिन लेखन ही वह हिस्सा है जहां फिल्म थोड़ी कमजोर पड़ जाती है। फिल्म की कहानी में दम तो है, लेकिन कई किरदारों को ठीक से नहीं दिखाया गया है। विज़ुअली, ‘पूजा मेरी जान’ चीजों को सरल और स्वाभाविक रखती है। जिष्णु भट्टाचार्य की सिनेमैटोग्राफ़ी कॉलेज के माहौल, थिएटर परफॉर्मेंस और शहर के नजारों को अच्छे से दिखाती है, जिससे फिल्म अपना-अपना और भरोसेमंद लगता है।
साथ ही, मशहूर म्यूजिक कंपोजर विशाल मिश्रा के बनाए गाने जबरदस्ती थोपे हुए नहीं लगते। फिल्म के पहले हिस्से में निर्देशन और सिनेमैटोग्राफी अच्छे हैं। गानों को भी कहानी में बहुत स्वाभाविक ढंग से पिरोया गया है। फिल्म में जो बात मुझे पसंद नहीं आई, वह है किरदारों का ठीक से न उभर पाना। हालांकि फिल्म ज्यादातर पूजा, अनिकेत और दूसरे मुख्य किरदारों पर फोकस करती है, लेकिन पूजा और अनिकेत के परिवार और दोस्तों जैसे कई अन्य किरदारों को और ज्यादा स्क्रीन टाइम और बेहतर ढंग से दिखाए जाने की जरूरत थी। पूजा और विक्रम के रिश्ते और उनकी पिछली कहानी (बैकस्टोरी) पर भी और ध्यान दिया जाना चाहिए था। इस वजह से, फिल्म के अंत तक उनसे जुड़ना या उनकी कहानी में दिलचस्पी लेना मुश्किल हो जाता है। हालांकि, फिल्म की रफ्तार एक जैसी नहीं है। कुछ हिस्से, खासकर कोर्टरूम वाले सीन, काफी लंबे लगते हैं और उन्हें छोटा किया जा सकता था।
पूजा मेरी जान: क्या अच्छा है और क्या नहीं
फिल्म का डायरेक्शन पहले हाफ में सबसे अच्छा है, जब फिल्म पूजा और अनिकेत पर फोकस करती है और धीरे-धीरे उनके रिश्ते के बीच के टकराव को दिखाती है। जिष्णु भट्टाचार्जी की सिनेमैटोग्राफी चीज़ों को सिंपल और नैचुरल रखती है, जिसमें कॉलेज का माहौल, थिएटर परफॉर्मेंस और शहर के नज़ारे अच्छे से दिखाए गए हैं। विशाल मिश्रा का म्यूज़िक भी कहानी में नैचुरली घुल-मिल जाता है और ज़बरदस्ती या बेमेल नहीं लगता।
फिल्म में जो बात मुझे पसंद नहीं आई, वह है किरदारों का ठीक से डेवलप न होना। हालांकि पूजा और अनिकेत कहानी के सेंटर में रहते हैं, लेकिन उनके परिवार और दोस्तों के बारे में ज्यादा कुछ नहीं दिखाया गया है। पूजा और विक्रम के रिश्ते पर भी और ध्यान देने की ज़रूरत थी, खासकर उनकी बैकस्टोरी और इस बात पर कि वे एक कपल के तौर पर कैसे साथ रहते हैं। इस वजह से फिल्म के आखिर तक उनसे जुड़ना या उनकी कहानी में दिलचस्पी लेना मुश्किल हो जाता है।
पूजा मेरी जान: आखिरी फैसला
‘पूजा मेरी जान’ एक बार देखने लायक फिल्म है। कागज़ पर यह अच्छी लगती है, लेकिन इसका फाइनल रिजल्ट सब्जेक्ट और कहानी के साथ न्याय नहीं कर पाता। हालांकि फिल्म टॉक्सिक मैस्कुलिनिटी (ज़हरीली मर्दानगी), समाज की सोच और महिलाओं पर दोष मढ़ने जैसे जरूरी सवाल उठाती है, लेकिन इसे जिस तरह से पेश किया गया है, उससे इसका असर थोड़ा कम हो जाता है। परफॉर्मेंस, खासकर मृणाल ठाकुर की एक्टिंग, कहानी को कुछ हिस्सों में दिलचस्प बनाए रखती है, लेकिन धीमी रफ्तार और किरदारों का ठीक से डेवलप न होना इसे पीछे खींचता है। फिल्म में अच्छे और बुरे दोनों तरह के पल हैं, लेकिन बेहतर स्क्रीनप्ले और किरदारों के बेहतर डेवलपमेंट से यह और भी असरदार फिल्म बन सकती थी।



